गत दो वर्षों में ख्याति के पायदान पर चढ़ने वालों में सबसे पहले चंद्रशेखर आज़ाद "रावण" और उनके तहत सहयोगी विनय रतन द्वारा बनायीं गयी भीम आर्मी का नाम सबसे ऊपर आता है। भीम आर्मी का कैडर दोगुनी गति से बढ़ता गया है। राजनितिक गलियारों में चंद्रशेखर और भीम आर्मी को नज़रअंदाज़ कर पाना नामुमकिन सा होता प्रतीत होता है । राजनितिक दल अपनी सहूलियत के हिसाब से भीम आर्मी के कार्यों की निंदा अनिन्दा करती रही है।एक तरफ जहां दलित, पिछड़े तथा मुस्लिम आबादी का एक बड़ा तबका भीम आर्मी के कार्यकलापों का समर्थन व सराहना कर रहा है, वही दूसरी तरफ दलित, पिछड़े तथा मुस्लिम समुदाय का राजनितिक गलियारों से झांकता हुआ तबका मौके और सहूलियत के हिसाब से आलोचना कर लेता है। कपिल आज़ाद (जिलाध्यक्ष, भीम आर्मी, गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश) के अनुसार भीम आर्मी के सक्रिय और असक्रिय कैडर की संख्या पूरे देश में करीब दो करोड़ है।
ये आंकड़ा राजनितिक पार्टियों की आँखें खोलने के लिए खासा हो सकता है। कपिल आज़ाद के अनुसार भीम आर्मी की सबसे अधिक मज़बूती उत्तर प्रदेश से अधिक महाराष्ट्र में हैं। बातचीत के दौरान कपिल आज़ाद ने बताया की "भीम आर्मी को अगर ज़रूरत महसूस होगी तो जनता के निर्णय के हिसाब से भीम आर्मी सक्रीय राजनीती में प्रवेश करने से हिचकिचाएगी नहीं।"
इस लेख को लिखते समय भीम आर्मी एक अपंजीकृत, गैर राजनितिक सामाजिक संस्था है (भीम आर्मी के प्रवक्ता के अनुसार)। भीम आर्मी के गतिविधियां, बढ़ती लोकप्रियता और कैडर का बढ़ता ग्राफ लेफ्ट, राइट और सेंटर, तीनो विचारधाराओं की पार्टियों की आँखों से अनभिज्ञ नहीं है।
भीम आर्मी की क्या संभावनाएं हो सकती है और क्यों?
एक राष्ट्रव्यापी कैडर होने के कारण राजनितिक पंडित अपने अपने हिसाब से भीम आर्मी का गणित बिठाते हुए पाए गए हैं। क्या भीम आर्मी एक अपंजीकृत (या पंजीकृत) सामाजिक संगठन के रूप में ही कार्य करेगी, या अपने विशाल कैडर को राजनितिक जामा पहनकर बसपा के खाली सीटों को भरने सत्ता के गलियारों में भेजेगी?
दलित राजनीती के परिपेक्ष्य को देखते हुए ये कहा जा सकता है की भीम आर्मी ( चंद्रशेखर) और बसपा (मायावती) के बीच कुछ ख़ास मधुर सम्बन्ध नहीं रहे हैं। हालांकि चंद्रशेखर, मायावती को बुआ का दर्जा देते हुए बसपा को निशर्त समर्थन देने की बात करते दिखाई दिए हैं। वहीँ दूसरी तरफ मायावती ने चंद्रशेखर को आड़े हाथों लेते हुए "भाजपा का एजेंट" बता दिया था। ये बात पिछले आम चुनावों की हैं।
मायावती की ये छींटाकशी कांग्रेस समेत अन्य दलों की संज्ञान में थी। राजनीतिक नूराकुश्ती को समझते हुए प्रियंका गाँधी (राज बब्बर सहित) चंद्रशेखर से अस्पताल में मुलाकात करती हैं । उसके कुछ समय बाद भीम आर्मी, कांग्रेस पार्टी के स्थानीय लोकसभा उम्मीदवार इमरान मसूद को समर्थन कर देती है। हालाँकि इसके तुरंत बाद भीम आर्मी के प्रवक्ता को इस निर्णय के कारण को बताना पड़ता है। कारण में वे ये बताते हैं की ये समर्थन कांग्रेस को नहीं बल्कि स्थानीय उम्मीदवार इमरान मसूद को है, क्यूंकि इमरान मसूद ने भीम आर्मी की उस वक़्त मदद की थी, जब कोई उनकी मदद को तैयार नहीं था।
इस पूरे प्रकरण में एक बात गौर करने वाली है की भीम आर्मी को कांग्रेस प्रत्याशी को समर्थन देते के साथ ही समर्थन का कारण बताना पड़ा। ये लेख भी बहुत कुछ इसी प्रकरण के इर्द गिर्द घूमता दिखाई देता है।
क्या हो सकता है यदि......?
1 . भीम आर्मी एक सामाजिक संगठन रहकर कार्य करती है, या...2 . भीम आर्मी स्वयं को राजनितिक दल में परिवर्तित कर लेती है।
संभावना प्रथम के अनुसार यदि भीम आर्मी स्वयं को सामाजिक दायरे तक सीमित रखती है तो उसके पास मात्र एक ही विकल्प बचता है की किसी दलित राजनितिक दल को समर्थन दे,(अति संभावित बसपा को, जिसकी मायावती के "भाजपा एजेंट" वाले कथन के बाद उम्मीद न के बराबर ही हैं)। अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें बार बार सपने समर्थन का स्पष्टीकरण देना होगा( जैसा की कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद के परिपेक्ष्य में देखा जा चूका है) और बार बार स्पष्टीकरण कहीं न कहीं घातक ही सिद्ध हो सकता है भीम आर्मी के अस्तित्व के लिए। संभावना दो के अनुसार यदि भीम आर्मी स्वयं को राजनितिक दल में परिवर्तित कर लेती है तो इस प्रकार के समर्थन और आगामी स्पष्टीकरण की छीछालेदर से बिलकुल साफ़ बचा जा सकता है। साथ ही साथ बसपा और मायावती की लगातार हार की कारण खाली हुआ दलित राजनितिक मैदान को भीम आर्मी व चंद्रशेखर भरने में सक्षम हो सकेगा। भीम आर्मी का बढ़ता हुआ कैडर इस का गहन कारण कहा जा सकता है।
पहली संभावना के अनुसार बसपा थोड़ी आसानी महसूस कर सकती है, क्यूंकि इस संभावना के अनुरूप भीम आर्मी को बसपा को समर्थन देना मज़बूरी सिद्ध होगी, चाहे भीम आर्मी चाहे या न चाहे। दूसरी संभावना के अनुसार बसपा का थका हारा कैडर भीम आर्मी और चंद्रशेखर के रूप में एक नए लीडर को पायेगी। एक तरफ जहां मायावती को मिलना बसपा के कार्यकर्ता के लिए भी मुश्किल है वहीँ दूसरी तरफ चंद्रशेखर से मिलना कोई ऐसा ख़ास मुश्किल नहीं है। इस संदर्भ में निश्चित रूप से ही बसपा के क्षत विक्षत कैडर को एक नया जोश व स्फूर्ति की सम्भावना चंद्रशेखर की नेतृत्व में की जा सकती है।
प्रथम संभावना के अनुरूप गैर दलित राजनितिक संगठन चाहे वो कांग्रेस हो, भाजपा हो, समाजवादी पार्टी हो, या कोई अन्य दल हो, उन्हें अपने दलित कैडर को रोक पाने में खासी दिक्कत का सामना कर पड़ सकता है, क्यूंकि भीम आर्मी और बसपा का एक बैनर निश्चित रूप से दलित राजनैतिक व्यक्तित्व को निश्चित रूप से आकर्षित कर पायेगा। हालाँकि बसपा और भीम आर्मी का साथ होने की कल्पना का खंडन देश के कई राजनितिक पंडित पहले ही कर चुके हैं (मायावती के "भाजपा एजेंट" वाले कथन के कारण)। दूसरी संभावना के अनुरूप अन्य राजनितिक दलों का रुख चंद्रशेखर के व्यक्तित्व और क्षमता पर निर्भर करता है की वो बसपा समेत अन्य दलों से किस मात्रा में दलित, पिछड़ा और मुस्लिम समुदाय को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।
अभी के हालातों और राजनितिक उठापटक को देखते हुए ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है की आने वाले समय में चंद्रशेखर आज़ाद "रावण" और भीम आर्मी देश को एक नया राजनितिक विकल्प दे सकते हैं ।।
- अरविन्द वी. प्रकाश
(लेखक पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ में इतिहास का छात्र है)






